मेरे ब्लॉग पर आने के लिये धन्यवाद! आपकी टिप्पणी का (चाहे अंग्रेजी में भी हो) स्वागत है!

Friday, May 23, 2008

वर्तमान भारत की छ: विनाशक गलतियां



india_flagभारत का राष्ट्र ध्वज
नानी पालकीवाला को आप पढ़ें तो वे कई स्थानों पर कहते नजर आते हैं कि वयस्क मताधिकार को संविधान में स्वीकार कर भारत ने बहुत बड़ी गलती की। और नानी जो भी कहते हैं उसे यूं ही समझ कर नहीं उड़ाया जा सकता।

नानी पालकीवाला के एक लेख का संक्षेप प्रस्तुत करता हूं, जिसमें उन्होने इस समय के भारत की छ: विनाशक गलतियों की बात कही है; और वयस्क मताधिकार की अवधारणा की गलती उसमें से पहली है।

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छ: गलतियां -


  1. Palkiwalaनानी पालकीवाला
    हमारी सबसे बड़ी गलती थी कि हमने चुनाव में वयस्क मताधिकार की प्रक्रिया अपनायी। अन्य किसी जनतन्त्र ने वयस्क मताधिकार को अपनाने की इतनी भारी कीमत नहीं चुकाई। औरों ने प्रारम्भ में मताधिकार सीमित संख्या में चुने हुये लोगों को ही दिया था। राजाजी और सरदार पटेल ने वयस्कमताधिकार को लागू करने के पहले जनता को शिक्षित करने पर जोर दिया था, जिससे वे मताधिकार की योग्यता हासिल कर सकें। महान जनतंत्र में किसी योग्यताप्राप्त नागरिक को मत देने का अधिकार होना चाहिये।
  2. हमने दूसरी विनाशक गलती यह की कि अपनी जनंसख्या को तीन गुना होने दिया। हमारी सारी आर्थिक उपलब्धियां बेलगाम जनसंख्या के आगे अर्थहीन हो जाती हैं।
  3. हमारी सबसे दुर्भग्यकारी गलती यह हुई कि हमने अपनी आबादी को शिक्षित करने के कोई ठोस प्रयास नहीं किये, जो उनमें समझ विकसित कर सके कि किस उम्मीदवार को मत देना है। मूल्यों पर आर्धारित शिक्षा में कोई "राजनैतिक सेक्स अपील" नहीं होती।
  4. हमने अपनी जनता को देश की संस्कृति की जानकारी देने की जो नीति अपनाई है, उसके तहद लोगों को सांस्कृतिक विरासत और सम्पदा के ज्ञान/सूचना से विरत रखा जाता है।
  5. हमारा शासन अभी तक लोगों में राष्ट्रीय तादात्म्य की भावना को दृढ़ता तथा स्थाई रूप से बिठाने में असफल रहा है। हमें इस प्रकार के सवाल सदा परेशान करते हैं कि भारत एक राष्ट्र है या अनेक समुदायों का समूह। क्या भारत राष्ट्रविहीन देश है? भारत का सबसे भयंकर अभिशाप है - जातिवाद। वह प्लेग से भी ज्यादा खतरनाक है - जिससे भारत पहले कभी ग्रस्त था। और इस गलती के भीषण दुष्परिणाम आगे हमें भुगतने हैं।
  6. हमने अपने मत से राजनीतिज्ञों को यह गलत अहसास दे दिया है कि वे बिना जिम्मेदारी की भावना के पूरी आजादी बरतने के हकदार हैं। भारत में न अनुशासन की भावना है, न राष्ट्रीय समर्पण की।
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पोस्ट स्क्रिप्ट: यह रही वह पुस्तक (चित्र देखें, प्रकाशक राजपाल एण्ड संस; अनुवाद बहुत बढ़िया नहीं है।) और यह रहा रिडिफ पर का नानी पालकीवाला के एक इण्टरव्यू का लिंक। इण्टरव्यू कई वेब पेजों में है।

मैं पुन: कहता हूं कि आप नानी से सहमत हों न हों। पर आप उन्हें इग्नोर नहीं कर सकते। नानी पालकीवाला अब इस दुनियाँ में नहीं हैं, पर उनका व्यक्तित्व/कृतित्व भविष्य में पीढियों को प्रेरणा देता रहेगा।


Thursday, May 22, 2008

थोड़ा HTML तो जानना होगा ब्लॉगिंग के लिए


मेरी HTML सम्बन्धित पोस्ट पर पाठकों की टिप्पणियां हैं, कि:
  • हमें तो HTML की बेसिक जानकारी नहीं है।
  • यह तकनीकी बात तो सिर से निकल गयी।
  • देखते हैं, कोशिश करते हैं, बाकी अपना फील्ड नहीं है यह!
  • मान गए हजूर कि आप फ़ुल्टू तकनीकी हो, अपन के पल्ले तो पड़ता नई ये सब!
  • आप अपने ब्लॉग में पता नही क्या क्या करते रहते हैं ...
  • यदि समझ आ गया तो रिकॉर्ड स्थापित हो जाएगा।
  • पहले html की abcd सीखनी पड़ेगी।
  • आप लगता है भूल गये कि आपका ..... पत्ता इसीलिये कट गया था क्योंकि आप तकनीकी रूप से सक्षम पाये गये थे।

मैं मानता हूं कि आम ब्लॉगर कोई प्रोग्रामर/सॉफ्टवेयर डेवलपर नहीं है। और मेरा भी कार्य क्षेत्र ट्रेन-गाड़ी परिचालन का है; सॉफ्टवेयर का नहीं। उम्र भी 52+ की हो चुकी है, लिहाजा यह कोई सम्भावना भी नहीं है कि एक नये क्षेत्र में कुछ कर गुजरेंगे। पर यह जरूर है कि अगर आप ब्लॉगिंग कर रहे हैं और अपने ब्लॉग को फलता फूलता देखना चाहते हैं तो न केवल आपको अपने ब्लॉग का लेखन स्तर, उसकी विषय वस्तु, लेखन की आवृति, नियमितता, अपनी टिप्पणियों का स्प्रेड और उनकी गुणवत्ता पर ध्यान देना होगा, वरन आप किस प्रकार अपनी पोस्ट और अपना ब्लॉग परोस रहे हैं - उसके प्रति भी सजग रहना होगा।

कुछ सरल HTML प्रयोग:

ब्लिंक एण्ड ब्लश - स्टाइल से

गलोती गलती सुधार
सुप स्क्रिप्ट
स्क्रिप्ट

साइकल के हेण्डल पर फुरसतिया

और इस सजगता के लिये HTML की बेसिक जानकारी आनी ही चाहिये। शुरू-शुरू में यह नहीं आती। पर आपको अपना कुछ समय उसमें इनवेस्ट करना चाहिये। मैं यह मानकर चल रहा हूं कि आम हिन्दी ब्लॉगर अपना ब्लॉग प्रेजेण्टेशन सुधारने के लिये दमड़ी खर्च करने की और प्रोफेशनल सुविधा/सहायता लेने की नहीं सोच सकते। ऐसे में खुद ही थोड़ा बहुत "ऑपरेशन ब्लॉग चमको" चलाना होगा। आप यह मान लें कि थोड़े बहुत HTML से आपकी रचनात्मकता बढ़ जायेगी और ब्लॉग से खेलने में मन लगेगा। आप अपनी साइडबार को और अधिक उपयोगी बना सकेंगे।

मैने हिन्दी ब्लॉगजगत का विस्तृत परिभ्रमण नहीं किया है, अत: कह नहीं सकता कि कोई सज्जन अपने ब्लॉग पर हिन्दी मेँ सरल सुग्राह्य तरीके से HTML सिखा रहे हैं या नहीं। पर एक तकनीकी जानकार को इस दिशा में सर्वजन हिताय गम्भीर पहल अवश्य करनी चाहिये। और लोगों (मैं समाहित) को रस ले कर सीखना चाहिये।

इति तकनीकी प्रवचनार्थ पोस्ट! बाकी आप माने न मानें - हरि इच्छा!


Wednesday, May 21, 2008

मच्छरों से बचाव में प्रभावी वनस्पतियां


आज की बुधवासरीय अतिथि पोस्ट में श्री पंकज अवधिया मच्छरों से बचाव के लिये अनेक जैविक विकल्पों की चर्चा कर रहे हैं। ये जैविक विकल्प बहुत आकर्षक लगते हैं। मुझे अपनी ओर से कुछ जोड़ना हो तो बस यही कि आदमी सफाई पसन्द बने तथा पानी को आस-पास सड़ने न दे। बाकी आप अवधिया जी का लेख पढ़ें।   

mosquito_bitingखून चूसती मादा मच्छर

डाँ. प्रवीण चोपडा जी ने कुछ समय पहले लिखी आपनी पोस्ट मे मच्छरों के विषय मे जिक्र किया था कि सुबह-सुबह पोस्ट लिखने के समय ये बहुत परेशान करते हैं और मुझसे कुछ वनस्पतियो के विषय मे जानकारी चाही थी। मैने उन्हे कुकरौन्दा का नाम सुझाया था। पता नहीं उन्होने इसका उपयोग किया या नहीं पर आज मै इस पोस्ट में मच्छरो पर प्रभावी वनस्पतियों के विषय मे लिखूंगा।

कुकरौन्दा का वैज्ञानिक नाम ब्लूमिया लेसेरा है और छत्तीसगढ में इसे कुकुरमुत्ता कहा जाता है। (आप इसे मशरुम न समझें। मशरुम को हमारे यहाँ फुटु कहा जाता है।) ब्लूमिया पूरे देश में खरपतवार की तरह उगता है। आप अपने आस-पास इसे आसानी से देख सकते हैं। इसकी पत्तियाँ तम्बाखू की पत्तियों की तरह होती हैं और इनसे तेज गन्ध आती है - कुछ-कुछ कपूर से मिलती-जुलती। यह तेज गन्ध इसमे उपस्थित तेल के कारण आती है। आमतौर पर पत्तियों को जलाकर धुँआ करने से मच्छर भाग जाते हैं पर अधिक प्रभाव के लिये इसके तेल का उपयोग होता है। प्राचीन भारतीय ग्रंथों मे इस वनस्पति को सम्माननीय स्थान प्राप्त है। श्वाँस रोगों के लिये इसका प्रयोग होता है। इसे हर्बल सिगरेट में भी डाला जाता है।

आमतौर पर हम जो क्वाइल्स का इस्तमाल करते है या लिक्विड जलाते हैं उसमे एलीथ्रीन होता है जो कि एक रासायनिक कीटनाशी है। इसका धुँआ हमे नुकसान करता है पर विकल्प न होने के कारण देश भर में इसका उपयोग होता है। ब्लूमिया का धुँआ स्वास्थ्य के लिये लाभदायक है। यह आस-पास बेकार पौधे की तरह उगता है इसलिये लागत बच जाती है। इससे सस्ते मे मच्छरनाशक बनाया जा सकता है। कुछ वर्षो पहले दिल्ली के व्यापारियों ने इसमे रुचि दिखायी थी। उन्होने मेरे मार्गदर्शन मे यह उत्पाद बनाया और फिर बाजार मे सेम्पल उतारे। ग्राहकों की प्रतिक्रिया सकारात्मक रही। पर स्थापित ब्राण्डों के कुशल बाजार प्रबन्धन के चलते जल्दी ही उन्हे हाथ खींचना पड़ा।

mosquito_crazy आप तो जानते है कि मच्छर किसी भी उत्पाद के प्रति प्रतिरोधी हो जाते हैं कुछ समय में। इसलिये ब्लूमिया के कई नये रुप भी बनाये गये थे। एक बार बरसात के दिनो मे जंगल मे ही रात गुजारनी पड़ी। कीड़ों से बचने के लिये साथ चल रहे स्थानीय लोगों ने भिरहा नामक पेड़ की पत्तियों को जलाया। उसका प्रभाव गजब का था। उन्होने बताया कि घर में इसे जलाने से छोटे बच्चे इसके धुँये की कडवाहट के कारण रोने लगते हैं। मैने इस पत्ती को आजमाया ब्लूमिया के साथ और सफलता मिली। नीम को तो आजमाया ही गया। मच्छरों के अलावा मख्खियों को भी भगाने के लिये इसमे बच नामक वनस्पति को मिलाया गया। आपने पहले पढा है कि बच में वातावरण को साफ रखने की क्षमता होती है।

इन वनस्पतियो को मिलाकर जो उत्पाद बना उसके बहुत से उपयोग थे। बीमार व्यक्ति के कमरे में इसे जलाने से लेकर मख्खियों और मच्छरों को भगाने तक में इसकी उपयोगिता थी। इसमे चाक मिलाकर चीटीयों के लिये उपयोग किया जा सकता था। इस उत्पाद में केन्द्रीय भूमिका ब्लूमिया की ही थी।

होली मे हर बार अखबारों के माध्यम से मै ब्लूमिया को व्यापक पैमाने पर जलाने की अपील करता हूँ। यह धुँआ हवा को शुद्ध तो करेगा ही साथ ही मच्छरों से भी आधुनिक शहरों को मुक्ति दिलवायेगा। आज ग्रामीण बेरोजगारों की बडी आबादी हमारे गाँवो में है। यदि स्वयमसेवी संस्थाएं पहल करें तो ऐसे उत्पादो को उनके माध्यम से बनवाकर अच्छा बाजार उपलब्ध करवा कर उनकी सहायता की जा सकती है।

ब्लूमिया के चित्र और लेख १ 

ब्लूमिया के चित्र और लेख २

बच के चित्र और लेख १

बच के चित्र और लेख २

भिरहा के चित्र और लेख १

भिरहा के चित्र और लेख २

भिरहा के चित्र और लेख ३

पंकज अवधिया

© लेख पर सर्वाधिकार श्री पंकज अवधिया का है।


Tuesday, May 20, 2008

आलोक ९-२-११, फटी बिवाई और फॉयरफॉक्स ३-बीटा


फॉयरफॉक्स पर आलोक ९-२-११ ने फरवरी में लिखी अपनी स्पेशल कबीरपन्थी स्टाइल (यानी जिसे समझने के लिये बराबार का साधक होना अनिवार्य है) में पोस्ट। अपनी समझ में नहीं आयी सो उसपर टिपेरे भी नहीं। यह जरूर याद आता है कि पढ़ी थी और उससे फॉयरफॉक्स के उस पन्ने पर भी गये थे जहां से फॉयरफॉक्स ३ बीटा को डाउनलोड करना था। उस पन्ने पर भी डेवलेपर टेस्टिंग जैसे हाई-टेक शब्द थे और डाउनलोड 7MB का था। लिहाजा हम दबे पांव वापस हो लिये थे।

अब आलोक जी ने हमारी ट्रैक्टर वाली पोस्ट में टिप्पणी में कहा है कि फॉयरफॉक्स ३ से फुल्ली जस्टीफाइड टेक्स्ट का फटा फटा नजर आना खतम हो जाता है। यानी फॉयरफॉक्स ३ हिन्दी नेट ब्राउजिंग के लिये इचगार्ड/रिंगकटर/जालिमलोशन या ऐसा कोई मलहम हो गया जो फटी बिवाई ठीक करता है।

हमने दोपहर की नींद, जो बुद्ध पूर्णिमा की छुट्टी से नसीब हुई थी, काट कर पहला काम फॉयरफॉक्स ३ बीटा को इन्स्टॉल करने का किया। और जो सामने आया वह सूपर मस्त था। आप फॉयरफॉक्स ३ बीटा के पहले फटी बिवाई वाला और उसके बाद चमकदार अक्षरों वाला वही पेज फॉयरफॉक्स में देखें। यह एक नये ब्लॉग - पोयम कलेक्शन श्रेय तिवारी का पेज है।

फटी बिवाई वाला पुराने फॉयरफॉक्स में पेज

Before

फॉयरफॉक्स ३ बीटा में स्पष्ट चमकदार दिखता पेज

After

आलोक ९-२-११ की जै। आप लगे हाथ फॉयरफॉक्स ३ बीटा इन्स्टॉल कर लें, अगर पहले ही न किया हो! हां, यह आपके कई ऐड-ऑन गायब कर देता है और उसमें गूगल सर्च भी है!

अब हम होते हैं नौ दो ग्यारह!


ट्रैक्टर ट्रॉली का जू-जू


ट्रैक्टर और ट्रॉली का युग्म मुझे हाथी की तरह एक विचित्र जीव नजर आता है। हाथी में हर अंग अलग-अलग प्रकार का नजर आता है - एक लटकती सूंड़, दो तरह के दांत, भीमकाय शरीर और टुन्नी सी आंखें, जरा सी पूंछ। वैसे ही ट्रैक्टर-ट्रॉली में सब कुछ अलग-अलग सा नजर आता है। मानो फॉयरफॉक्स में फुल्ली जस्टीफाइड हिन्दी का लेखन पढ़ रहे हों।@ सारे अक्षर बिखरे बिखरे से।

रेलवे, लेवल क्रॉसिंग के प्रयोग को ले कर जनजागरण के लिये विज्ञापन पर बहुत खर्च करती है। पर आये दिन दुर्घटनाओं, बाल बाल बचने या बंद रेलवे क्रॉसिंग के बूम तोड़ कर ट्रैक्टर भगा ले जाने की घटनायें होती हैं। लगता है ढ़ेरों फिदायीन चल रहे हों ट्रैक्टरों पर।


JUGADजुगाड़ का एक जीवन्त चित्र श्री नरेन्द्र सिंह तोमर द्वारा
शहर और गांव में दौड़ती ट्रेक्टर ट्रॉलियां मुझे बहुत खतरनाक नजर आती हैं। कब बैलेन्स बिगड़े और कब पलट जायें - कह नहीं सकते। रेलवे के समपार फाटकों पर तो ये नाइटमेयर हैं - दुस्वप्न। बहुत अनस्टेबल वाहन। ईट या गन्ने से लदे ये वाहन आये दिन अनमैन्ड रेलवे क्रॉसिन्ग पर ट्रेन से होड़ में दुर्घटना ग्रस्त होते रहते हैं। वहां इनके चालक सामान्यत ग्रामीण नौजवान होते हैं। उनके पास वाहन चलाने का लाइसेंस भी नहीं होता (वैसे लाइसेंस जैसे मिलता है, उस विधा को जान कर लाइसेंस होने का कोई विशेष अर्थ भी नहीं है) और वे चलाने में सावधानी की बजाय उतावली पर ज्यादा यकीन करते प्रतीत होते हैं। इसके अलावा, ट्रैक्टर और ट्रॉलियों का रखरखाव भी स्तर का नहीं होता। कई वाहन तो किसी कम्पनी के बने नहीं होते। वे विशुद्ध जुगाड़ ब्राण्ड के होते हैं। यह कम्पनी (आंकड़े नहीं हैं सिद्ध करने को, अन्यथा) भारत में सर्वाधिक ट्रैक्टर बनाती होगी!

मुझे एक रेल दुर्घटना की एक उच्चस्तरीय जांच याद है - ट्रैक्टर ट्रॉली का मालिक जांच में बुलाया गया था। याकूब नाम का वह आदमी डरा हुआ भी था और दुखी भी। ट्रैक्टर चालक और ४-५ मजदूर मर गये थे। कुछ ही समय पहले लोन ले कर उसने वह ट्रैक्टर खरीदा था। जांच में अगर ट्रैक्टर चालक की गलती प्रमाणित होती तो उसके पैसे डूबने वाले थे और पुलीस केस अलग से बनने वाला था। पर याकूब जैसा भय व्यापक तौर पर नहीं दीखता। रेलवे, लेवल क्रॉसिंग के प्रयोग को ले कर जनजागरण के लिये विज्ञापन पर बहुत खर्च करती है। पर आये दिन दुर्घटनाओं, बाल बाल बचने या बंद रेलवे क्रॉसिंग के बूम तोड़ कर ट्रैक्टर भगा ले जाने की घटनायें होती हैं। लगता है ढ़ेरों फिदायीन चल रहे हों ट्रैक्टरों पर।tractor01

ट्रैक्टर ट्रॉली की ग्रामीण अथव्यवस्था में महत भूमिका है। और किसान की समृद्धि में वे महत्वपूर्ण इनग्रेडियेण्ट हैं। पर भारत में सोने का अण्डा देने वाली मुर्गी को हलाल कर सब अण्डे एक साथ निकाल लेने का टेम्प्टेशन बहुत है। ट्रैक्टर - ट्रॉली के रखरखाव पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जाता। जुगाड़ का न केवल ग्रामीण खेती और माल वहन में योगदान है, वरन यात्री वाहन के रूप में बहुपयोगी है। बहुत सी शादियां जुगाड़ परम्परा में जुगाड़ और ट्रॉली के प्रयोग से होती हैं।

मैं यह अन्दाज नहीं लगा पा रहा हूं कि डीजल और अन्य पेट्रोलियम उत्पादों की बढ़ती कीमतों के चलते ट्रेक्टर-ट्रॉली-जुगाड़ सीनारियो में कुछ बदलाव आयेगा या इनका जू-जू कायम रहेगा।


@ आजकल हर रोज डबल डिजिट में नये ब्लॉग उत्पन्न हो रहे हैं और उनमें से बहुत से फुल्ली जस्टीफाइड तरीके से अपनी पोस्ट भर रहे हैं। फॉयरफॉक्स में आप उनपर क्लिक करने के बाद दबे पांव वापस चले आते हैं। वर्ड वेरीफिकेशन तो बहुतों ने ऑन कर रखे हैं। नयी कली सुनिश्चित करती है कि वह कांटों से घिरी रहे! कोई उसे पढ़ने-टिप्पणी करने की जहमत न उठाये!

Monday, May 19, 2008

ब्लॉग पोस्ट में फोटो सब-टाइटल (कैप्शन) का जुगाड़


सिद्धार्थ जी फोटो पर कैप्शन लगाने के बारे में पूछ रहे थे। मेरी समझ में यह आया कि वे चित्र का विवरण देते शब्द चित्र के साथ चिपकाना चाहते हैं। ब्लॉगस्पॉट के पोस्ट एडीटर में यह सरलता से सम्भव नही। फ्लिकर से आप अपनी फोटो पर डिस्क्रिप्शन फील्ड में विवरण भर कर अगर सीधे ब्लॉग करें तो चित्र के नीचे केप्शन के रूप में डिस्क्रिप्शन आ जाता है। पर वह ब्लॉगिंग का सरल/सुविधायुक्त तरीका नहीं है। मैने विण्डोज लाइवराइटर के साथ कुछ प्रयोग पहले किये थे, जिनका विवरण यहां पर मिल सकता है।

Photo Subtitleकालांतर में मैने कई पोस्टों में पुलकोट में चित्र इन्सर्ट कर उसका सब-टाइटल साथ जोड़ा था। उदाहरण के लिये आप यह रेगुलरहा सुकुल वाली पोस्ट का अवलोकन करें। पुलकोट का जुगाड़ आप सागरचन्द नाहर जी के ब्लॉग पर पायेंगे।

अपनी पिछली पोस्ट में मैने डा. कल्ला के चित्र के नीचे उनके नाम का सब-टाइटल (केप्शन) दिया था। वह देने के लिये मैने एक HTML स्क्रिप्ट का प्रयोग किया था। आप पिछली पोस्ट के अंश का चित्र दाईं ओर देखें। इस चित्र में ड़ा. कल्ला के फोटो के आस-पास दस पिक्सल का मार्जिन रखा गया है, जिससे उनका चित्र और लेख आपस में बम्प करते - सटे हुये न प्रतीत हों।

इस प्रयोग के लिये आप इस प्रकार जुगाड़ कर सकते हैं -

Photo Subtitle A यह रही HTML स्क्रिप्ट। यह केप्शन अगर बहुत लम्बा हो तो भी चित्र के इर्दगिर्द ही रहेगा!

  1. आप HTML स्क्रिप्ट का चित्र (बायें) देखें जिसे मैने ड़ा. कल्ला के चित्र के लिये प्रयोग किया था। इस स्क्रिप्ट को यहां से डाउनलोड कर सकते हैं।
  2. इस स्क्रिप्ट में float: left का अर्थ चित्र को बायीं ओर लगाने से है। अगर आपको चित्र दायीं ओर लगाना है तो float: right का प्रयोग करें।
  3. आप padding-top: 1px या padding-bottom: 1px निकाल सकते हैं।
  4. ड़ा. कल्ला का नाम चित्र में दायीं ओर एलाइन है। आप अगर केप्शन बाईं ओर या मध्य में एलाइन करना चाहें तो text-align: left या text-align: center का प्रयोग करें।
  5. इस HTML स्क्रिप्ट में केप्शन AAAAAAAA है। आप केप्शन बदल कर जो रखना चाहें, वह लिख दें।
  6. यह HTML स्क्रिप्ट अपनी पोस्ट पर यथास्थान लगा कर चित्र बिना ले-आउट (लेफ्ट/राइट/सेण्टर) के लोड करें। फिर चित्र पर कर्सर को ले जा कर ड्रैग करें और केप्शन (AAAAAAAA) के पहले ले आयें।
  7. अगर आपका लोड किया चित्र 250 पिक्सेल से बड़ा/छोटा है तो आप HTML स्क्रिप्ट में तदानुसार width: ---px सेट करे। अर्थात पिक्सेल कम/ज्यादा करें।

ऊपर मैने HTML स्क्रिप्ट के चित्र के लिये margin-right: 40px का रखा है, जिससे कि लिस्ट-टेक्स्ट की नम्बरिंग (1., 2., --- आदि) न दबे। टेक्स्ट एलाइन लेफ्ट (text-align: left) रखा है। और कृपया, "यह रही HTML स्क्रिप्ट...." नामक केप्शन का अवलोकन करें; जो उस चित्र के नीचे बायें एलाइन है, और है चित्र की चौड़ाई की सीमा में ही!


श्री विजयशंकर चतुर्वेदी जी ने टिप्पणी की थी कि बुरी पोस्ट कब लिखेंगे? और मैने देर नहीं लगाई। मुझे पूरा अविश्वास है कि पहले सर्राटा पठन में मित्रगण इस पोस्ट में से कुछ जूस निकाल पायेंगे। कुछ लोग सटक लेंगे और कुछ लिहाजवश टेनटेटिव सी टिप्पणी कर जायेंगे।

है ही सूखी सी पोस्ट! Confused


Sunday, May 18, 2008

फीडबर्नर अनुसार मेरी दस सबसे लोकप्रिय पोस्टें


फीडबर्नर कई प्रकार के आंकड़े देता है। एक है अब तक के सर्वाधिक व्यू और क्लिक्स के आधार पर लोकप्रिय पोस्टों के आंकड़े।

feedburner stats

इसके आधार पर मेरी अब तक की सर्वाधिक व्यू/क्लिक की गयी पोस्टें हैं -

फोटो में कैप्शन लगाने की तकनीक २२ अक्तूबर २००७
डुप्लीकेट सामान बनाने का हुनर १८ अक्तूबर २००७
ई-पण्डित को धन्यवाद - विण्डोज लाइवराइटर के लिये १४ अक्तूबर २००७
बरखा बिगत सरद रितु आई २ अक्तूबर २००७
पापा, मैं तो घास छीलूंगा! २९ अक्तूबर २००७
एक पुरानी पोस्ट का री-ठेल ३४ अक्तूबर २००७
फीड एग्रेगेटर - पेप्सी या कोक २६ अक्तूबर २००७
’जय हिन्द, जय भारत, जय लालू’ २५ अक्तूबर २००७
व्योमकेश शास्त्री उर्फ हजारी प्रसद द्विवेदी - लेख का स्कैन २७ अक्तूबर २००७
तहलका तारनहार है मोदी का?(!) ३० अक्तूबर २००७

मजे की बात है कि ये सारी पोस्टें अक्तूबर २००७ की हैं। अब या तो हमारे पोस्ट ठेलने में उसके बाद दम नहीं रहा या फिर फीडबर्नर स्वर्ण युग के दर्शन भूतकाल में किया करता है?! heart_brokensmile_embaressed


और यह देख कर मैं फीडबर्नर की बजाय स्टैटकाउण्टर के आंकड़ों पर ज्यादा भरोसा करूंगा!!!


Saturday, May 17, 2008

राजाराम मांझी


Dr Kalla
डा. एन के कल्ला
नाम तो ऐसा लग रहा है जैसे कोई स्वतंत्रता सेनानी हो। जैसे तिलका मांझी। मैं इन सज्जन पर न लिखता अगर डा. एन के कल्ला ने एक रेखाचित्र बना कर मेरी ओर न सरकाया होता। डा. कल्ला हमारे चीफ मैडिकल डायरेक्टर हैं। हम उत्तर-मध्य रेलवे की क्षेत्रीय उपभोक्ता सलाहकार समिति की बैठक में समिति के सदस्यों के भाषण सुन रहे थे। ऐसे में इधर उधर कलम चलाने और डॉडल (dawdle - फुर्सत की खुराफात) करने को समय मिल जाता है। उसी में एक अलग से लग रहे चरित्र श्री राजाराम मांझी का रेखाचित्र डा. कल्ला ने बना डाला।

आप श्री राजाराम मांझी का रेखा चित्र और उनका मोबाइल से लिया चित्र देखें -


श्री राजाराम मांझी

Rajaram Manjhi Rajaram

राजाराम मांझी चुपचाप बैठे थे बैठक में। अचानक उनकी गोल के एक सदस्य पर किसी स्थानीय सदस्य ने टिप्पणी कर दी। इतना बहुत था उन्हें उत्तेजित करने को। वे खड़े हो कर भोजपुरी मिश्रित हिन्दी में धाराप्रवाह बोलने लगे। बहुत ही प्रभावशाली था उनका भाषा प्रयोग। वैसी भाषा ब्लॉग पर आनी चाहिये।

बाबा तिलका मांझी (1750-84) पहले संथाल वीर थे जिन्होने अंग्रेजों के खिलाफ आदिवासी संघर्ष किया। उनका गोफन मारक अस्त्र था। उससे उन्होने अनेक अंग्रेजों को परलोक भेजा। अन्तत: अंग्रेजों की एक बड़ी सेना भागलपुर के तिलकपुर जंगल को घेरने भेजी गयी। बाबा तिलका मांझी पकड़े गये। उन्हे फांसी न दे कर एक घोड़े की पूंछ से बांध कर भागलपुर तक घसीटा गया। उनके क्षत-विक्षत शरीर को कई दिन बरगद के वृक्ष से लटका कर रखा गया।

भोजन के समय सब लोग प्लेट में खा रहे थे। मांझी जी अखबार को चौपर्त कर उसमें भोज्य सामग्री ले कर खाते हुये टहल रहे थे हॉल में। किसी ने कौतूहल वश कारण पूछ लिया। उन्होंने बताया कि प्लेट अशुद्ध होती है। यह समझ नहीं आया कि कृत्रिम अजैव रसायन से बनी स्याही के साथ छपा अखबार कैसे शुद्ध हो सकता है? पर यह भारत है और उपभोक्ता सलाहकार बैठक में विचित्र किन्तु सत्य भारत के दर्शन हो जाते हैं!

श्री राजाराम मांझी के दो अन्य चित्र

Rajaram2 Rajaram3


DAILY ESSENTIAL THOUGHTS

चलते चित्र का लिंक

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